हल्द्वानी में शिक्षा विभाग सख्त, 27 निजी स्कूलों को नोटिस, 10 नए शामिल..

हल्द्वानी में शिक्षा विभाग सख्त, 27 निजी स्कूलों को नोटिस, 10 नए शामिल..

 

 

उत्तराखंड: नैनीताल जिले के हल्द्वानी क्षेत्र में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। अभिभावकों पर महंगी किताबों का बोझ डालने और निर्धारित नियमों की अनदेखी करने के आरोप में 10 और निजी विद्यालयों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। प्रशासन ने संबंधित स्कूलों को 15 दिनों के भीतर संतोषजनक जवाब देने और व्यवस्थाओं में सुधार करने के निर्देश दिए हैं, अन्यथा सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। यह कार्रवाई जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के निर्देश पर की गई है। मुख्य शिक्षा अधिकारी गोविंद राम जायसवाल द्वारा जांच रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया गया है। इससे पहले भी 17 निजी विद्यालय प्रशासन की निगरानी में आ चुके हैं, जिससे स्पष्ट है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए अभियान लगातार जारी है।

जांच के दौरान यह सामने आया कि कई स्कूलों ने निर्धारित एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की पुस्तकों के स्थान पर निजी प्रकाशनों की महंगी किताबें अनिवार्य कर दीं, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ा। इसके साथ ही कुछ विद्यालयों द्वारा छात्रों और अभिभावकों को विशेष दुकानों से ही किताबें खरीदने के लिए बाध्य करने की शिकायतें भी मिली हैं, जो नियमों का उल्लंघन है। इतना ही नहीं, कई स्कूलों की वेबसाइट पर फीस संरचना और पुस्तक सूची जैसी जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं पाई गई, जबकि यह जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य है। प्रशासन ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 और न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत कार्रवाई योग्य माना है।

प्रशासन ने संबंधित विद्यालयों को निर्देश दिए हैं कि वे 15 दिनों के भीतर संशोधित पुस्तक सूची जारी करें, एनसीईआरटी किताबों को प्राथमिकता दें और किसी भी प्रकार की अनिवार्य खरीद व्यवस्था समाप्त करें। साथ ही अभिभावकों से पहले खरीदी गई अतिरिक्त किताबों के लिए धन वापसी या समायोजन सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए गए हैं। यदि किसी प्रकार की अतिरिक्त फीस वसूली गई है तो उसे आगामी शुल्क में समायोजित करने को कहा गया है। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तय समय सीमा में आदेशों का पालन नहीं करने वाले स्कूलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। इसमें मान्यता निलंबन या निरस्तीकरण जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। इस अभियान को अभिभावकों के हितों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम पहल के रूप में देखा जा रहा है।