उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्ती की मांग, हाईकोर्ट में हुई सुनवाई..

उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्ती की मांग, हाईकोर्ट में हुई सुनवाई..

उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्ती की मांग, हाईकोर्ट में हुई सुनवाई..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्लास्टिक कचरे और उससे पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर दायर जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण सुनवाई की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता को अपनी सभी मांगों का विस्तृत प्रतिवेदन राज्य के मुख्य सचिव को सौंपने के निर्देश दिए हैं। साथ ही मुख्य सचिव से कहा गया है कि वह याचिका में उठाए गए सुझावों और मांगों पर नियमानुसार विचार कर उचित निर्णय लें। अदालत ने इस जनहित याचिका को पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक अन्य लंबित मामले के साथ भी जोड़ दिया है। मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे प्लास्टिक कचरे और उसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की गई।जनहित याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों, ऊंचाई वाले बुग्यालों, ग्लेशियरों और ट्रैकिंग मार्गों पर हर वर्ष लाखों श्रद्धालु, पर्यटक और पर्वतारोही पहुंचते हैं। अधिकांश लोग अपने साथ पानी की प्लास्टिक बोतलें, पैक्ड फूड, डिस्पोजेबल सामग्री और अन्य सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पाद लेकर जाते हैं, लेकिन वापसी के समय इन्हें नीचे नहीं लाते। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा जमा होता जा रहा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह कचरा केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे जंगलों, नदियों, नालों, बुग्यालों और ग्लेशियरों तक फैल रहा है। इससे न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है, बल्कि वन्यजीवों, जल स्रोतों और प्राकृतिक जैव विविधता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि इस समस्या पर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

याचिका में धार्मिक आयोजनों और पर्यटक गतिविधियों के लिए भी सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। सुझाव दिया गया है कि प्रमुख धार्मिक स्थलों, ट्रैकिंग रूटों और बुग्यालों में अधिकृत अधिकारियों की नियुक्ति की जाए, जो यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक श्रद्धालु, ट्रेकर या पर्यटक अपने साथ ले जाए गए प्लास्टिक पैकेट, बोतलें और अन्य कचरे को वापस लेकर आए। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता है तो उसके खिलाफ आर्थिक दंड की व्यवस्था लागू की जाए।याचिकाकर्ता ने यह मुद्दा भी उठाया कि प्रदेश में होने वाले भंडारे, धार्मिक समारोह, शादी-विवाह और अन्य बड़े आयोजनों में बड़ी मात्रा में डिस्पोजेबल प्लास्टिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अक्सर प्लास्टिक के गिलास, प्लेटें, बोतलें और अन्य कचरा खुले स्थानों पर छोड़ दिया जाता है, जिससे आसपास का वातावरण प्रदूषित होता है और सफाई व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए याचिका में आयोजकों से बॉन्ड भरवाने का सुझाव दिया गया है। प्रस्ताव के अनुसार किसी भी बड़े आयोजन की अनुमति देने से पहले आयोजक से यह लिखित आश्वासन लिया जाए कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद पूरे क्षेत्र की सफाई कराई जाएगी। यदि निर्धारित समय में कचरा नहीं हटाया जाता है तो संबंधित संस्था या आयोजक पर जुर्माना लगाया जाए। साथ ही वसूली गई राशि का उपयोग सफाई कार्य करने वाले कर्मचारियों या एजेंसियों को भुगतान के लिए किया जाए। अदालत ने फिलहाल मामले में अंतिम निर्णय नहीं दिया है, लेकिन राज्य सरकार को इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने और याचिकाकर्ता के सुझावों पर गंभीरता से विचार करने का संकेत दिया है। माना जा रहा है कि यदि भविष्य में इस संबंध में प्रभावी नीति बनाई जाती है तो उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों, ट्रैकिंग मार्गों, बुग्यालों और ग्लेशियरों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।