अश्वमेध यज्ञ स्थल पर खुदाई के दौरान मिले मिट्टी के बर्तन व ईंटों के अवशेष..

अश्वमेध यज्ञ स्थल पर खुदाई के दौरान मिले मिट्टी के बर्तन व ईंटों के अवशेष..

 

 

 

उत्तराखंड: देहरादून जनपद के चकराता क्षेत्र अंतर्गत कालसी के बाढ़वाला स्थित जगतग्राम में मौजूद ऐतिहासिक अश्वमेध यज्ञ स्थल पर एक बार फिर पुरातात्विक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने यहां 73 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दोबारा खुदाई का कार्य शुरू किया है। खुदाई का उद्देश्य तीसरी शताब्दी ईस्वी के कुणिंद शासक राजा शीलबर्मन द्वारा कराए गए चार अश्वमेध यज्ञ स्थलों में से चौथी वेदिका की खोज करना है। बताया जा रहा है कि यज्ञ से जुड़े शास्त्रीय वर्णनों में चार वेदिकाओं का उल्लेख मिलता है, जबकि वर्तमान में इस स्थल पर तीन वेदिकाएं पहले से स्थापित और संरक्षित हैं। चौथी वेदिका के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे खोजने के लिए दिसंबर 2025 से पुनः उत्खनन कार्य आरंभ किया गया है, जो अब भी जारी है।

खोदाई के दौरान एक मीटर से अधिक गहराई में मिट्टी के बर्तनों के अवशेष और जले हुए कोयले के प्रमाण सामने आए हैं, जो यज्ञ अनुष्ठानों से जुड़े होने की संभावना जताते हैं। गुरुवार को हुई खुदाई में इन अवशेषों के साथ-साथ ईंटों के टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं। इन सभी सामग्री को वैज्ञानिक परीक्षण के लिए सुरक्षित रखा गया है, ताकि स्थल के वास्तविक कालक्रम और संरचनात्मक स्वरूप को स्पष्ट किया जा सके। उल्लेखनीय है कि कालसी गेट स्थित अशोक शिलालेख के समीप बाढ़वाला के जगतग्राम में स्थित यह अश्वमेध यज्ञ स्थल वर्ष 1953-54 में एएसआई द्वारा की गई खुदाई के दौरान सामने आया था। उसी समय यह स्पष्ट हुआ था कि राजा शीलबर्मन ने यहां चार अश्वमेध यज्ञ कराए थे। उस दौरान तीन यज्ञ वेदिकाओं की पहचान हो चुकी थी, जिन्हें बाद में भारत सरकार द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया गया।

एएसआई के अधिकारियों के अनुसार चौथी वेदिका की खोज से इस ऐतिहासिक स्थल के धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व को और अधिक समझने में मदद मिलेगी। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि कुणिंद काल में अश्वमेध यज्ञ की परंपरा किस स्वरूप में प्रचलित थी। इस संबंध में सहायक पुरातत्वविद पी.एस. राणा ने बताया कि स्थल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए पूरी वैज्ञानिक विधि से खुदाई की जा रही है। प्राप्त अवशेषों का विश्लेषण किए जाने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि चौथी वेदिका के प्रमाण मिलते हैं, तो यह उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों में भी इस खुदाई को लेकर उत्सुकता देखी जा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में खुदाई से और भी महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं, जो उत्तराखंड के प्राचीन वैदिक और कुणिंद कालीन इतिहास पर नई रोशनी डालेंगे।