वन महकमे की पहल पर सवालों की छाया, फायर मिटिगेशन मीटिंग में HOD नदारद..

वन महकमे की पहल पर सवालों की छाया, फायर मिटिगेशन मीटिंग में HOD नदारद..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में वनाग्नि की चुनौती हर साल गंभीर रूप लेती है। इसी खतरे को देखते हुए देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) में वन विभाग की ओर से विभिन्न विभागों और संस्थाओं के साथ एक अहम समन्वय बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य जंगलों में आग की घटनाओं की रोकथाम, त्वरित नियंत्रण और बेहतर समन्वित रणनीति तैयार करना था। इस बैठक में राज्य के करीब 31 विभागों और संस्थानों के प्रमुख अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था। इनमें आपदा प्रबंधन, नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण, गढ़वाल और कुमाऊं मंडलायुक्त, यू-सैक, यूकॉस्ट, एसडीआरएफ, अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा, स्वास्थ्य, पंचायती राज, शिक्षा, उरेडा और कृषि विभाग जैसे अहम विभाग शामिल थे।

हालांकि बैठक के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आमंत्रित किए गए अधिकांश विभागाध्यक्ष स्वयं उपस्थित नहीं हुए। कई विभागों ने अपनी ओर से अधीनस्थ अधिकारियों को भेजा। वनाग्नि जैसे संवेदनशील और राज्यव्यापी संकट के मुद्दे पर शीर्ष स्तर की अनुपस्थिति ने प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर सवाल खड़े कर दिए। भले ही अधिकारियों की व्यस्तता एक कारण हो सकती है, लेकिन इतने बड़े स्तर पर गैरमौजूदगी यह संकेत देती है कि कई विभागों में वनाग्नि को अभी भी सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। बैठक के दौरान इस बात पर विस्तृत चर्चा की गई कि अलग-अलग विभाग जंगलों में आग की रोकथाम और प्रबंधन में किस प्रकार की भूमिका निभा सकते हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों पर निर्भर है, वहां फॉरेस्ट फायर केवल वन विभाग का विषय नहीं बल्कि बहु-विभागीय समन्वय का मामला है। पर्यावरणीय संतुलन, जल स्रोत, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए इसे सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में लिया जाना जरूरी है। प्रमुख वन संरक्षक हॉफ रंजन कुमार मिश्रा ने स्वीकार किया कि यदि सभी विभागों के प्रमुख अधिकारी स्वयं उपस्थित होते तो बेहतर संदेश जाता। उन्होंने कहा कि जो प्रतिनिधि आए, उनके साथ रचनात्मक चर्चा हुई और कई सकारात्मक सुझाव सामने आए। उनका कहना था कि वन विभाग की कोशिश है कि इस वर्ष वनाग्नि प्रबंधन को लेकर हर स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

मुख्य वन संरक्षक (वनाग्नि) सुशांत पटनायक ने बताया कि इस बार विभाग ने तैयारियों को पहले से अधिक सुदृढ़ किया है। संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर ली गई है, फायर वॉचरों की तैनाती बढ़ाई गई है और तकनीकी संसाधनों के उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सैटेलाइट मॉनिटरिंग और जियोस्पेशियल डेटा के उपयोग से आग की घटनाओं का शीघ्र पता लगाने की योजना बनाई गई है।

बैठक में शामिल कुछ विभागों ने अपनी तकनीकी और मानवीय संसाधनों को वनाग्नि प्रबंधन से जोड़ने की इच्छा जताई। यू-सैक जैसे संस्थान सैटेलाइट और मैपिंग तकनीक के माध्यम से निगरानी में सहयोग कर सकते हैं। वहीं आपदा प्रबंधन, एसडीआरएफ और अग्निशमन विभाग त्वरित फील्ड रिस्पॉन्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा सहायता सुनिश्चित कर सकता है, जबकि पंचायती राज और शिक्षा विभाग जागरूकता अभियान के जरिए ग्रामीण समुदाय को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस समन्वय को परखने के लिए 18 फरवरी को एक मॉक ड्रिल आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस अभ्यास के माध्यम से यह जांचा जाएगा कि वास्तविक स्थिति में विभिन्न विभाग किस तरह एकजुट होकर कार्रवाई करते हैं और कहां सुधार की जरूरत है। मॉक ड्रिल का उद्देश्य केवल औपचारिकता नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर कमियों की पहचान कर उन्हें दूर करना है।

उत्तराखंड में हर वर्ष सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है। इसका असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वन्यजीवों, जल स्रोतों, मिट्टी की उर्वरता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। ऐसे में वनाग्नि प्रबंधन के लिए एकीकृत रणनीति और शीर्ष स्तर की गंभीरता अनिवार्य है। वन विभाग की पहल को सकारात्मक कदम माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सभी विभाग इसे साझा जिम्मेदारी के रूप में नहीं लेंगे, तब तक प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित रह सकती है। उत्तराखंड में इस बार वनाग्नि से निपटने की तैयारी पहले से बेहतर बताई जा रही है, अब यह देखना अहम होगा कि विभागीय समन्वय जमीन पर कितनी मजबूती से दिखाई देता है।